देश का पहला 'ओनली फॉर लेडीज' BPO

 

नई दिल्ली - उत्तरी राजस्थान के बागड़ इलाके में रहने वाली 24 साल की मीरा सैनी दो साल पहले स्कूल में पढ़ाती थीं। इस काम में उन्हें मजा नहीं आ रहा था। उसी दौरान उन्होंने बागड़ की सड़कों पर ऑटो रिक्शे से एक एनाउंसमेंट सुनी। इसमें एक नए बीपीओ से जुड़ने का न्योता दिया जा रहा था। यह न्योता सोर्स फॉर चेंज (एसएफसी) नाम के बीपीओ से मिला था। यह भारत का पहला बीपीओ है, जिसमें सिर्फ महिलाएं काम करती हैं।

मीरा ने बताया, 'बीपीओ से शुरू में मुझे जो तनख्वाह ऑफर हुई, वह मेरी तब की सैलरी से कम थी लेकिन मैं देश की अकेली महिला बीपीओ में काम करना चाहती थी। मुझे यह भी लगा कि बीपीओ में नौकरी करके कंप्यूटर सीखने का भी मौका मिलेगा। इसलिए मैंने स्कूल की नौकरी छोड़कर बीपीओ ज्वाइन कर लिया।' एसएफसी 2007 में शुरू हुआ था, तब इसमें 10 महिलाएं काम करती थीं। आज इससे 40 महिलाएं जुड़ी हैं। एसएफसी के सीईओ की जिम्मेदारी कार्तिक रमण के कंधों पर है। उन्होंने बताया कि अगले साल जनवरी तक काम करने वाली महिलाओं की संख्या 100-150 करने की योजना है। उन्होंने बताया कि अगले तीन साल में महिला कर्मियों की संख्या 1000 करने की योजना है। रमण ने बताया कि एसएफसी के अब तक के कामकाज के दौरान उन्हें कई चीजें सीखने को मिलीं और अब यह बीपीओ तेजी से कारोबार बढ़ाने के लिए तैयार है।

एसएफसी के मुख्य ग्राहकों में पिरामल ग्रुप और बच्चों के लिए काम करने वाला बीपीओ प्रथम शामिल हैं। एसएफसी में नौकरी के लिए महिला का 10वीं पास होना जरूरी है। यहां ज्यादातर डाटा एंट्री का काम होता है। इस बीपीओ ने राजस्थान में शूटिंग करने आए ब्रिटिश फिल्म निर्माता के लिए ट्रांसक्रिप्शन का काम भी किया है। एसएफसी के नए ग्राहकों में राजस्थान सरकार और कन्फेडरेशन ऑफ इंडियन इंडस्ट्री (सीआईआई) शामिल हैं। सीआईआई ने पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर डाटाबेस अपडेट करने का काम इस बीपीओ को सौंपा है। एसएफसी जल्द ही पिरामल हेल्थकेयर के ई-स्वास्थ्य अभियान के लिए भी काम शुरू करेगी। सीईओ रमण ने बताया कि एसएफसी को इस मुकाम तक लाने के दौरान सबसे ज्यादा मुश्किलें कर्मचारियों को ट्रेनिंग देने में हुई। वैसे एसएफसी उन्हीं महिलाओं को नौकरी देती है, जिन्हें अंग्रेजी आती हो। इसके बावजूद उसे दो महीने तक इन लोगों को अंग्रेजी ग्रामर, उच्चारण और कंप्यूटर की ट्रेनिंग देनी पड़ती है। एसएफसी के पास ट्रेनर नहीं थे, इसलिए बीपीओ ने अपनी एक ट्रेंड महिला कर्मचारी को यह जिम्मेदारी सौंपी।

उन्होंने अपनी दूसरी साथियों को ट्रेनिंग दी।एसएफसी में काम करने वाली सुनीता चौधरी ने बताया कि पहले इस इलाके में पढ़ी-लिखी महिलाओं के पास टीचर बनने के अलावा दूसरा रास्ता नहीं था। चौधरी का इरादा भी पहले टीचर बनने का था, हालांकि 2007 में उन्होंने एसएफसी को चुना। एसएफसी में आठ घंटे की शिफ्ट के लिए महीने भर में 3,500 रुपए मिलते हैं। पार्ट टाइम काम करने वालों को इसका आधा वेतन मिलता है। सैनी और चौधरी के लिए पैसा बहुत मायने नहीं रखता। सैनी का कहना है कि यहां सिर्फ महिलाएं काम करती हैं। हम एक-दूसरे की दिक्कत समझते हैं। सैनी के मुताबिक, एसएफसी में काम करने का अलग ही मजा है।
 

 

Posted on : Wednesday May 06, 2009 06:00 AM  इकनॉमिक टाइम्स   

 
 
 

 
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